बेटों को तो लोग गांव-कस्बों के सरकारी स्कूलों में भेजना ही नहीं चाहते। जोशी कहते हैं, रामलीला तो हमारी बेटियां बचा रही हैं लेकिन उत्तराखंड के अन्य लोकपर्वों से भी संकट टालना होगा।
जिन रामलीला के मंचों पर पुरुष, महिला पात्रों की भूमिका निभाते थे वहीं आज इसका उलट हो रहा है। अब बेटियों ने पुरुषों का किरदार निभाना शुरू कर दिया है। दशकों से पहाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहीं बेटियों ने अब उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रामलीलाओं को बचाने की जिम्मेदारी उठा ली है। पलायन से खाली हो रहे गांवों में जब पात्रों का संकट होने लगा तो स्कूल और खेत खलिहानों के साथ बेटियों ने मंच भी संभाल लिया। अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और नैनीताल के कई गांव और कस्बों में अब बेटियां ही मुख्य किरदार निभा रही हैं।
स्कूलों की तलाश में पहाड़ सबसे ज्यादा खाली हुए हैं
पहाड़ की रामलीलाओं में मुख्य अभिनय 12 से 14 साल के किशोर ही करते हैं। कोरोना टीकाकरण के लिए एकत्र की गई स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट बताती है, पहाड़ों में ऐसे किशोरों की संख्या बहुत कम रह गई है। पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चम्पावत में इस उम्र के महज 53,522 किशोर ही हैं। पहाड़ की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना पर 15 से अधिक किताबें लिख चुके प्रयाग जोशी कहते हैं, स्कूलों की तलाश में पहाड़ सबसे ज्यादा खाली हुए हैं। बेटों को तो लोग गांव-कस्बों के सरकारी स्कूलों में भेजना ही नहीं चाहते। जोशी कहते हैं, रामलीला तो बेटियां बचा रही हैं लेकिन उत्तराखंड के अन्य लोकपर्वों से भी संकट टालना होगा।

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